अंतर्राष्ट्रीय गुमशुदा बाल दिवस :25 मई 2026
देश में लापता बच्चों के हर 8 दर्ज मामलों में से करीब 1 मध्य प्रदेश से
वर्ष 2024 में मध्य प्रदेश में हर दिन औसतन 52 बच्चे लापता हुए, जिनमें 42 लड़कियाँ शामिल हैं।
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मध्य प्रदेश में मात्र एक वर्ष में लापता बच्चों के मामलों में लगभग 19% की वृद्धि दर्ज की गई है, जिसमें लड़कियाँ अब भी कुल मामलों का लगभग 80% हिस्सा हैं — यह जानकारी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की नवीनतम रिपोर्ट में सामने आई है।
भोपाल: मध्य प्रदेश भारत के सबसे गंभीर बाल सुरक्षा संकट वाले राज्यों में उभरकर सामने आया है, जहाँ देश में लापता बच्चों के हर 8 दर्ज मामलों में से 1 इसी राज्य से है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में राज्य में 19,131 बच्चों के लापता होने के मामले दर्ज हुए जो मध्य प्रदेश को लापता बच्चों के मामलों में देश के सभी राज्यों में दूसरे स्थान पर खड़ा करता है और राष्ट्रीय कुल का 13% है। यह संख्या 2023 में दर्ज 16,017 मामलों की तुलना में लगभग 19.44% की चिंताजनक वृद्धि दर्शाती है। यह विश्लेषण क्राई (चाइल्ड राइट्स एंड यू) द्वारा किया गया है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के समग्र आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में भारत में लापता बच्चों की कुल संख्या 1,47,175 रही, जिसमें ट्रांसजेंडर बच्चे भी शामिल हैं। इनमें से 1,11,271 लड़कियाँ थीं। राष्ट्रीय स्तर पर रुझान दर्शाते हैं कि 2023 से 2024 के बीच लापता बच्चों के मामलों में 6.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो 1,38,609 से बढ़कर 1,47,175 हो गई।
राज्य सरकार के प्रयासों की सराहना करते हुए, लेकिन बढ़ते मामलों पर गहरी चिंता जताते हुए क्राई की क्षेत्रीय निदेशक सोहा मोइत्रा ने कहा, “यह सराहनीय है कि राज्य लापता बच्चों की रिपोर्टिंग और ट्रेसिंग में सुधार के लिए सक्रिय कदम उठा रहा है। लेकिन खासतौर पर लड़कियों के मामलों में लगभग 22% की बढ़ोतरी बेहद चिंताजनक है। जब मध्य प्रदेश में औसतन हर दिन 42 लड़कियाँ लापता होती हैं, तो यह स्पष्ट करता है कि कई बच्चे खासकर लड़कियाँ आज भी असुरक्षित हैं। ट्रेसिंग प्रयासों को मजबूत करने के साथ-साथ रोकथाम में तुरंत और ठोस निवेश की जरूरत है, ताकि बच्चे लापता ही न हों।”
मध्य प्रदेश में लापता बच्चों में करीब 80% लड़कियाँ
मध्य प्रदेश में लापता बच्चों का संकट सबसे अधिक लड़कियों को प्रभावित कर रहा है। कुल मामलों में से 15,282 लड़कियाँ हैं यानी राज्य में लापता होने वाले लगभग 10 में से 8 बच्चे लड़कियाँ हैं।
यह तस्वीर 2023 में भी यही थी, जब 78.3% लापता बच्चे लड़कियाँ थीं जो दर्शाता है कि स्थिति में कोई खास सुधार नहीं आया है। यह मध्य प्रदेश को देश में लापता लड़कियों के मामलों में शीर्ष राज्यों में रखता है और किशोरियों के सामने बढ़ती असुरक्षाओं की ओर ध्यान खींचता है।
इंदौर और भोपाल में सबसे अधिक मामले
एनसीआरबी के जिला-स्तरीय आंकड़े बड़े शहरों में मामलों की उच्च संख्या को स्पष्ट रूप से सामने रखते हैं। इंदौर में सबसे अधिक 1,124 लापता बच्चों के मामले दर्ज किए गए, जिनमें इंदौर कमिश्नरेट से 861, इंदौर ग्रामीण से 261 और इंदौर रेलवे से 2 मामले शामिल हैं।
भोपाल 726 मामलों के साथ दूसरे स्थान पर रहा, जिनमें भोपाल कमिश्नरेट से 654, भोपाल ग्रामीण से 64 और रेलवे से 8 मामले हैं। अन्य प्रभावित जिलों में जबलपुर (613), सागर (571), धार (487) और खरगोन (467) शामिल हैं जो यह बताता है कि यह संकट सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं, बल्कि छोटे शहर और ग्रामीण इलाके भी इसकी चपेट में हैं।
लगभग 5,000 बच्चे अब भी नहीं मिले
लगातार कोशिशों के बावजूद, वर्ष 2024 में मध्य प्रदेश में 4,886 बच्चे अब भी नहीं खोजे जा सके जो 2023 के 4,835 मामलों के करीब है। यह लंबित मामलों की एक चिंताजनक स्थिति को दर्शाता है।
राज्य में 2024 की ट्रेसिंग दर 74.5% रही, जो 2023 के 69.8% से बेहतर है और व्यवस्था की बढ़ती कार्यक्षमता को दिखाती है। लेकिन लापता बच्चों की बढ़ती संख्या के कारण अनट्रेस्ड मामले अब भी चिंताजनक स्तर पर बने हुए हैं जो दर्शाता है कि सुधार के बावजूद, बच्चों को ढूंढने की व्यवस्था इस संकट की रफ्तार से पीछे है।
लंबित मामलों का बोझ जारी
यह संकट लंबित मामलों के बोझ से और गहरा हो जाता है। वर्ष 2024 में जहाँ 14,296 नए बच्चे लापता दर्ज किए गए, वहीं पिछले सालों के अनट्रेस्ड मामलों को जोड़ने पर यह संख्या 19,131 तक पहुँच जाती है।
2023 में भी यही पैटर्न देखा गया 75.5% मामले नए थे और 24.5% पहले से लंबित। यह दर्शाता है कि स्थिति की बुनियादी तस्वीर नहीं बदली है नए मामले लगातार आ रहे हैं और पुराने मामले अनसुलझे पड़े हैं।
यह इस गंभीर सच्चाई को सामने लाता है कि बड़ी संख्या में बच्चे लंबे समय तक लापता रहते हैं जो इन मामलों की ट्रैकिंग और समाधान में व्यवस्था की गहरी कमियों को उजागर करता है।
मजबूत और व्यापक कदमों की जरूरत
मोइत्रा ने कहा, “ये नतीजे साफ बताते हैं कि एक व्यापक, समन्वित और लगातार प्रयास की जरूरत है जिसमें किशोरियों के लिए रोकथाम तंत्र को मजबूत करना, लंबे समय से लापता मामलों की बेहतर ट्रैकिंग सुनिश्चित करना और पुलिस तथा बाल संरक्षण तंत्र के बीच बेहतर तालमेल बनाना शामिल है। लड़कियों पर इसका असर कहीं ज्यादा है, इसलिए एक ठोस और जेंडर-संवेदनशील नजरिया अपनाना बेहद जरूरी है।”
उन्होंने आगे कहा, “क्राई में हम समुदायों के साथ मिलकर बच्चों के लिए स्थानीय सुरक्षा तंत्र को मजबूत कर रहे हैं खासकर गाँव और पंचायत स्तर पर। ‘बालप्रहरी’ जैसी पहलों के जरिए, जहाँ बच्चे खुद समूह बनाकर जुड़ते हैं, हम लापता बच्चों, तस्करी, बाल श्रम और बाल विवाह जैसे मुद्दों पर जागरूकता और सतर्कता बढ़ा रहे हैं। साथ ही ग्राम पंचायत विकास योजना जैसी प्रक्रियाओं को मजबूत करके और बाल-अनुकूल गाँवों को बढ़ावा देकर, हम पंचायतों को जरूरतमंद परिवारों और बच्चों का डेटा बनाए रखने में मदद कर रहे हैं। इससे खतरे की समय पर पहचान होती है और समुदाय के स्तर पर रोकथाम की कोशिशों को बढ़ावा मिलता है।”







