तस्करी के पीड़ितों के लिए सुरक्षा का भरोसा कहाँ है?
तस्करी के पीड़ितों को सुरक्षा और न्याय की दरकार
दिल्ली। आज भी हमारे समाज में बाल मानव तस्करी का काला कारोबार खुलेआम पैर पसार रहा है। हालांकि, पिछले तीन वर्षों में स्वयंसेवी संस्थाओं और सरकारी एजेंसियों के साझा प्रयासों से 1.50 लाख से अधिक बच्चों को तस्करों के चंगुल से छुड़ाया गया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या उनका भविष्य वाकई सुरक्षित है? आज भी अनगिनत पीड़ित बच्चे अदालती कार्यवाहियों के शुरू होने, न्याय मिलने, उचित मुआवजे और सम्मानजनक पुनर्वास के इंतजार में अपनी जिंदगी पटरी पर लौटने की राह तक रहे हैं।

“देश का वास्तविक विकास इस बात से मापा जाना चाहिए कि हमारी सुरक्षा प्रणाली अपराधियों के पहुँचने से पहले हर बच्चे की ढाल बनकर खड़ी है या नहीं।” — भुवन रिभू (संस्थापक, ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन’)
जिम्मेदारी का अभाव और कानूनी पेचीदगियाँ
भारत में तस्करी रोकने के लिए कड़े कानून और प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन रोकथाम से लेकर दोषियों को सजा दिलाने और पीड़ितों के पुनर्वास तक की पूरी प्रक्रिया की जिम्मेदारी संभालने वाली कोई एक एकीकृत प्रणाली नहीं है। जवाबदेही की इसी कमी के कारण अपराधी बच निकलते हैं।
त्वरित न्याय और तस्करों की आर्थिक रीढ़ पर वार मामलों की सुनवाई में होने वाली देरी पीड़ितों पर मानसिक दबाव बढ़ाती है और गवाहों के भटकने का खतरा रहता है।
फास्ट-ट्रैक अदालतें: मुकदमों का निपटारा तय समय-सीमा के भीतर होना बेहद जरूरी है।
संपत्ति की जब्ती: तस्करी के इस संगठित गिरोह को पूरी तरह ध्वस्त करने के लिए केवल गिरफ्तारियाँ काफी नहीं हैं, बल्कि अपराधियों द्वारा अवैध रूप से अर्जित संपत्ति को जब्त करना और ग्राहकों व बिचौलियों पर नकेल कसना अनिवार्य है।
“देश का वास्तविक विकास इस बात से मापा जाना चाहिए कि हमारी सुरक्षा प्रणाली अपराधियों के पहुँचने से पहले हर बच्चे की ढाल बनकर खड़ी है या नहीं।” — भुवन रिभू (संस्थापक, ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन’







