प्रदेश में बाल विवाह की स्थिति चिंताजनक
हाईकोर्ट का आदेश-बाल विवाह के खिलाफ पूरे देश में उठाए जाएं सख्त कदम
-सरपंचों ने गठित किये बाल विवाह निगरानी दल
-कृषक सहयोग संस्थान के साथ सरपंचों ने रोके 154 संभावित बाल विवाह
-राजस्थान हाई कोर्ट ने जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जारी किया आदेश।

सांची जनपद पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी बन्दू सूर्यवंशी
अनिल भवरे रायसेन। अक्षय तृतीया पर जहां बाल विवाह के अधिक मामले देखने को मिलते हैं। ऐसे में बाल विवाह रोकथाम के लिए हाई कोर्ट का आदेश अधिक प्रभावी होगा। आदेश के पहले ही रायसेन में कलेक्टर के आदेश से सरपंचों ने निगरानी दलों का गठन कर बाल विवाह मुक्त जिला बनाने की पहल की है। बाल विवाह मुक्त भारत अभियान अंतर्गत जिले को बाल विवाह मुक्त बनाने कृषक सहयोग संस्थान कार्यरत है। संस्थान के निदेशक डॉ एच बी सेन ने बताया कि जिले में 68 ग्रामपंचायतों के सरपंचों ने अपने 150 गांवो में निगरानी दलों का गठन किया है। सरपंचों और निगरानी दलों के प्रयास से अब तक 154 से अधिक संभावित बाल विवाह विवाह होने के पूर्व ही रोकने में सफलता मिली है।
सरपंचों ने गठित किये बाल विवाह निगरानी दल
हाईकोर्ट ने लिया संज्ञान कहा,कड़ी नजर रखें-
देश मे हो रहे बाल विवाहों के मामले की गंभीरता और तात्कालिकता का संज्ञान लेते हुए राजस्थान हाई कोर्ट ने जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए आदेश जारी किया।
न्यायमूर्ति शुभा मेहता और पंकज भंडारी की खंडपीठ ने कहा,“सभी बाल विवाह निषेध अफसरों से इस बात की रिपोर्ट मंगाई जानी चाहिए कि उनके अधिकार क्षेत्र में कितने बाल विवाह हुए और इनकी रोकथाम के लिए क्या प्रयास किए गए।” खंडपीठ का यह आदेश अक्षय तृतीया से महज 10 दिन पहले आया है। याचियों द्वारा बंद लिफाफे में सौंपी गई अक्षय तृतीया के दिन होने वाले 54 बाल विवाहों की सूची पर गौर करने के बाद खंडपीठ ने राज्य सरकार को इन विवाहों पर रोक लगाने के लिए ‘बेहद कड़ी नजर’ रखने को कहा है।
बाल विवाह घृणित अपराध-
जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस के संस्थापक भुवन ऋभु ने कहा,“बाल विवाह वह घृणित अपराध है जो सर्वत्र व्याप्त है और जिसकी हमारे समाज में स्वीकार्यता है। बाल विवाह के मामलों की जानकारी देने के लिए पंचों व सरपंचों की जवाबदेही तय करने का राजस्थान हाई कोर्ट का यह फैसला ऐतिहासिक है। पंच व सरपंच जब बाल विवाह के दुष्परिणामों के बारे में जागरूक होंगे तो इस अपराध के खिलाफ अभियान में उनकी भागीदारी और कार्रवाइयां बच्चों की सुरक्षा के लिए लोगों के नजरिए और बर्ताव में बदलाव का वाहक बनेंगी। बाल विवाह के खात्मे के लिए भारत सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदम पूरी दुनिया के लिए एक सबक हैं और राजस्थान हाई कोर्ट का यह फैसला इस दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम है।”
स्थानीय नेतृत्व की जवाबदेही तय करता है आदेश-
कृषक सहयोग संस्थान के निदेशक डॉ एच बी सेन ने कहा,“राजस्थान हाई कोर्ट का यह आदेश ऐतिहासिक है जिसके दूरगामी नतीजे होंगे। देश में शायद पहली बार ऐसा हुआ है जब पंचायती राज प्रणाली को यह शक्ति दी गई है कि वह सरपंचों को अपने क्षेत्राधिकार में बाल विवाहों को रोकने में विफलता के लिए जवाबदेह ठहरा सके। जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस के सहयोगी के तौर पर हम पूरे देश के जिलाधिकारियों से इसी तरह के कदम उठाने की अपील करते हैं। जमीनी स्तर पर हमारी पहलों ने यह साबित किया है कि बाल विवाह जैसे मुद्दों के समाधान में सामुदायिक भागीदारी सबसे अहम है। यह अदालती आदेश बच्चों की सुरक्षा के लिए समुदायों को लामबंद करने में स्थानीय नेतृत्व की जवाबदेही की जरूरत को रेखांकित करता है।”
“जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस पांच गैरसरकारी संगठनों का एक गठबंधन है जिसके साथ 120 से भी ज्यादा गैरसरकारी संगठन सहयोगी के तौर पर जुड़े हुए हैं जो पूरे देश में बाल विवाह, बाल यौन शोषण और बाल दुर्व्यापार जैसे बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर काम कर रहे हैं।
हाई कोर्ट का यह आदेश ऐसे समय आया है जब अक्षय तृतीया के मौके पर बाल विवाह के मामलों में खासी बढ़ोतरी देखने को मिलती है और जिसे रोकने के लिए राज्य सरकारें और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ मिलकर जमीनी स्तर पर काम कर रहे तमाम गैरसरकारी संगठन हरसंभव प्रयास कर रहे हैं।”








